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Monday, 14 May 2012

झील के किनारे














चल मन ले चल मुझे झील के उसी किनारे !


जहाँ दिखा था पानी में प्रतिबिम्ब तुम्हारा ,
उस इक पल से जीवन का सब दुःख था हारा ,
कितनी मीठी यादों के थे नभ में तारे ,
चल मन ले चल मुझे झील के उसी किनारे !


जहाँ फिजां में घुला हुआ था नाम तुम्हारा ,
फूलों की खुशबू में था अहसास तुम्हारा ,
मीठे सुर में पंछी गाते गीत तुम्हारे ,
चल मन ले चल मुझे झील के उसी किनारे !


जहाँ हवा के झोंकों में था परस तुम्हारा ,
हर साये में छिपा हुआ था अक्स तुम्हारा ,
पानी पर जब लिख डाले थे नाम तुम्हारे ,
चल मन ले चल मुझे झील के उसी किनारे !


शायद अब भी वहीं रुकी हो बात तुम्हारी ,
किसी लहर में कैद पड़ी हो छवि तुम्हारी ,
मेरे छूने भर से जो जी जायें सारे ,
चल मन ले चल मुझे झील के उसी किनारे !


मन का रीतापन थोड़ा तो हल्का होगा ,
सूनी राहों का कोई तो साथी होगा ,
तुम न सही पर यादें होंगी साथ हमारे ,
चल मन ले चल मुझे झील के उसी किनारे !




साधना वैद




सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः

4 comments:

Asha Saxena said...

"मन का रीता पण छोड़ा तो हल्का होगा -----चल मन लेच्ल मुझे झील के उस पार "
भाव पूर्ण पंक्तियाँ |बहुत सुन्दर प्रस्तुति |
आशा

surendrshuklabhramar5 said...

जहां हवा के झोंको में था परस तुम्हारा ...बहुत सुंदर रचना .प्रेम के वे पल --यादगार लम्हे वहां की हर चीज ही प्यारी हो जाती है . आभार साधना जी ...बहुत ख़ुशी हुयी आप को इस मंच की शोभा बढ़ाते देख ....सुस्वागतम .... -भ्रमर ५

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना....

surendrshuklabhramar5 said...

आदरणीय कैलाश जी अभिवादन और कवि वृन्द के प्रोत्साहन हेतु आभार -भ्रमर ५