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Sunday, 1 July 2012

दूरियां




दूरियाँ बढ़ जाएँ यदि
मुश्किल पार जाना है
दूरियाँ घट जाने का
अंजाम अजाना है ।
जिसने समझा, सहा, देखा
पर पा न सका थाह दूरी की
पहेली थी जो दूरी की
रही फिर भी अधूरी ही ।
क्या है गणित दूरी का
ना समझो तो अच्छा है
निभ जाये जो जैसा है
वही रिश्ता ही सच्चा है ।
आशा
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः

2 comments:

surendrshuklabhramar5 said...

आदरणीया आशा जी इस छोटी सी रचना ने दूरियों कम करने की राह सिखा दी ..
ना समझो गणित दूरी का , ना समझो तो अच्छा है , निभ जाये जो जैसा है वाही रिश्ता ही सच्चा है ...
हाँ ऐसा भी है किसी तरह से प्रेम से निभ जाए ....
सुन्दर ....
भ्रमर ५

रविकर फैजाबादी said...

बढ़िया प्रस्तुति ||