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Sunday, 22 April 2012

चाँद भी खिसक गया


गोरी के आंचल में 
झिलमिल सितारे हैं 
चंदा को सूरज भी 
छिप के निहारे है 
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रेत के समंदर में 
बूँद एक उतरी तो 
ललचाई नजरों ने 
सोख लिया प्यारी को 
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उदय अंत में त्रिशंकु -
बन ! मै लटकता हूँ 
राहु -केतु से कटे भी 
दंभ लिए फिरता हूँ 
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चार दिन की जिन्दगी है 
चार पल की यारी है 
चाँद भी खिसक गया 
रात अंधियारी हैं 
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कल अंडा था 
बच्चा बनकर 
चीं चीं चूं चूं बोला 
खेला खाया 
उड़ा साथ कुछ 
मै रह गया अकेला 






MAA SAB MANGAL KAREN

4 comments:

Asha Saxena said...

अच्छी और भावपूर्ण रचना |
आशा

रविकर फैजाबादी said...

सुन्दर प्रस्तुति ।
आभार ।।

surendrshuklabhramar5 said...

आदरणीया आशा जी ..जय श्री राधे ..प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद और आभार
भ्रमर ५

surendrshuklabhramar5 said...

प्रिय रविकर जी रचना आप के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी -- धन्यवाद और आभार
भ्रमर ५