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Sunday, 8 April 2012

रविकर बूढ़ी देह, सेवता घर-भर बड़का

दूँ उसको आशीष, होय इक बोदा लड़का-

बोदा लड़का था बड़ा, पर छुटका विद्वान ।
मार-पीट घूमे-फिरे, सारा घर उकतान ।

सारा घर उकतान, करूँ नित मार कुटाई । 
छुटका बसा विदेश, पूर कर बड़ी पढ़ाई ।

रविकर बूढ़ी देह, सेवता घर-भर बड़का ।
दूँ उसको आशीष, होय इक बोदा लड़का ।।

2 comments:

Asha Saxena said...

भाई वाह क्या कहने |अच्छी रचना के लिए बधाई |
आशा

surendrshuklabhramar5 said...

रविकर बूढ़ी देह, सेवता घर-भर बड़का ।
दूँ उसको आशीष, होय इक बोदा लड़का ..
आदणीय रविकर जी हाँ ऐसा भी होता है ..जिसे हम नालायक बुद्धिहीन समझते हैं वह हमारे काम आ जाता है ..
सुन्दर रचना ---
जय श्री राधे
भ्रमर ५