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Sunday, 30 March 2014

सरदी ने पीठ दिखाई


 
मौसम ने ली अंगडाई 
सर्दी ने पीठ दिखाई 
धूप के तेवर बदले 
वे भी लगे बदले बदले 
पैर जलते धूप में 
पिधलता डम्बर
पक्की सड़क पर 
चलना दूभर होता 
घर के बाहर 
फिर भी कोई 
  काम न रुकता
 जीवन यूं ही चलता रहता |
आशा

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (01-04-2014) को "स्वप्न का संसार बन कर क्या करूँ" (चर्चा मंच-1562)"बुरा लगता हो तो चर्चा मंच पर आपकी पोस्ट का लिंक नहीं देंगे" (चर्चा मंच-1569) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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नवसम्वत्सर और चैत्र नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
कामना करता हूँ कि हमेशा हमारे देश में
परस्पर प्रेम और सौहार्द्र बना रहे।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Asha Saxena said...

सुप्रभात
सूचना हेतु आभार सर |