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Wednesday, 11 December 2013

क्षणिकाएं ( भाग २)

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः


क्षणिकाएं (भाग २)

(1)
मन से मन की बात यदि ना हो पाए 
मन चाही मुराद यदि मिल न पाए 
मन दुखी तब क्यूं न हो 
बेमौसम का राग वह क्यूँ गाए |
(२)
सुनी गुनी कही बातें 
वजन तो रखती हैं 
पर हैं कितने लोग 
जो उन पर अमल करते हैं |
(३)

मैंने सजाई थी महफिल
हंसने हंसाने को
पर देखी सिर्फ तानाकशी
खुशी गायब हो गयी
ज्ञान न था दिलों में
इतना विष घुला है
प्यार का तो ऊपरी दिखावा है
हर इंसान का दोहरा चेहरा है |..
(४)
 मधुमास में
 पतझड़ की बातें
शोभा नहीं देतीं
खुशी के आलम में
उदासी भर देतीं |
आशा

5 comments:

कालीपद प्रसाद said...

प्यार का तो ऊपरी दिखावा है
हर इंसान का दोहरा चेहरा है \
बहुत सुन्दर \
नई पोस्ट भाव -मछलियाँ
new post हाइगा -जानवर

Asha Saxena said...

टिप्पणी हेतु धन्यवाद कालीपद जी |

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (13-12-13) को "मजबूरी गाती है" (चर्चा मंच : अंक-1460) पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Asha Saxena said...

सूचना हेतु धन्यवाद सर |

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

बहुत सुन्दर क्षणिकाएं आशा जी ...भ्रमर 5