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Sunday, 12 May 2013

कामवाली बाई



शादी के मौसम में
व्यस्त सभी बाई रहतीं
सहन उन्हें करना पड़ता
बिना उनके रहना पड़ता
उफ यह नखरा बाई का
आये दिन होते नागों का
चाहे जब धर बैठ जातीं
नित नए बहाने बनातीं
यदि वेतन की हो कटौती
टाटा कर चली जातीं
 लगता है जैसे हम गरजू हैं
उनके आश्रय में पल रहे हैं
पर कुछ कर नहीं पाते
मन मसोस कर रह जाते |
आशा
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः

4 comments:

sadhana vaid said...

आज के युग के अनिवार्य सच से रू ब रू कराती बढ़िया रचना ! वाकई जितना हम लोग इन कामवाली बाइयों पर निर्भर होते जा रहे हैं इनके नखरे उतने ही बढते जा रहे हैं !

Asha Saxena said...

टिप्पणी हेतु धन्यवाद साधना जी |

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज सोमवार (13-05-2013) माँ के लिए गुज़ारिश :चर्चामंच 1243 में "मयंक का कोना" पर भी है!
सभी को मातृदिवस की बधाई हो...!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

अरुणा said...

अहम् रोल है आज के दौर में ........