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Tuesday, 21 June 2011

दर्द देख जब रो मै पड़ता


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बूढ़े जर्जर नतमस्तक हो

इतना बोझा ढोते

साँस समाती नहीं है छाती

खांस खांस गिर पड़ते !

दुत्कारे-कोई- लूट चले है

प्लेटफार्म पर सोते !

नमन तुम्हे हे ताऊ काका

सिर ऊंचा रख- फिर भी जीते !!

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वंजर धरती हरी वो करते

खून -पसीने सींचे !

कहें सुदामा -श्याम कहाँ हैं ?

पाँव विवाई फूटे !

सूखा -अकाल अति वृष्टि कभी तो

आँत ऐंठती बच्चे सोते भूखे !

कर्ज दिए कुछ फंदा डाले

कठपुतली से खेलें !

नमन तुम्हे हे ताऊ काका

पेट -पीठ से बांधे हो भी

पेट हमारा भरते !!

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बैल के जैसे घोडा -गाडी

जेठ दुपहरी खींचे !

जीभ निकाले पड़ा कभी तो

दो पैसे की खातिर कोई

गाली देता पीटे

बदहवास -कुछ-यार मिले तो

चले लुटाये -पी के !!

नमन तुम्हे हे ताऊ काका

दो पैसों से बच्चे तेरे

खाते -पढ़ते-जीते !!

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काले -काले भूत सरीखे

मैले कुचले फटे वस्त्र में

बच्चे-बूढ़े होते !

ईंट का भट्ठा-खान हो चाहे

मिल- गैरेज -में डटे देख लो

दिवस रात बस खटते !

नैन में भर के- ढांक -रहे हैं

इज्जत अपनी -रही कुंवारी

गिद्ध बाज -जो भिड़ के !

नमन तुम्हे- हे ! - तेज तुम्हारा

कल - दुनिया को जीते !!

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बर्फीली नदियों घाटी में

बुत से बर्फ लदे जो दिखते !

रेगिस्तान का धूल फांक जो

जलते - भुनते - लड़ते !

भूख प्यास जंगल जंगल

जान लुटाते भटकें !

कहीं सुहागन- विरहन -बैठी

विधवा- कहीं है रोती !

होली में गोली संग खेले

माँ का कर्ज चुकाते !

तुम को नमन हे वीर -सिपाही

दर्द देख -- जब रो मै पड़ता

तेरे अपने - कैसे -जीते !!

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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

२२.०६.२०११ जल पी बी

2 comments:

Babli said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

surendrshuklabhramar5 said...

उर्मी चक्रवर्ती जी बहुत बहुत धन्यवाद आप का प्रोत्साहन के लिए -अपना स्नेह सुझाव व् समर्थन बनाये रखें

शुक्ल भ्रमर ५