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Friday, 9 December 2011

सहनशीलता-

प्रस्तुत रचना आदरणीया आशा जी द्वारा लिखित है और सौभाग्य से इस ब्लाग के लिए प्राप्त हुयी है ...हम आदरणीया आशा जी से अनुरोध करेंगे की वे अपनी प्यारी रचनाओं से इस ब्लाग को अलंकृत करेंगी ...

हम अपने अन्य लेखक मित्रों से भी इस साहित्य प्रेमी मंच के लिए आगे कुछ योगदान करने का आग्रह करते हैं रचनाएं निम्न मेल पर भेजी जा सकती हैं ...

skshukl5@gmail.com,

धन्यवाद के साथ

भ्रमर

मन में दबी आग
जब भी धधकती है
बाहर निकलती है
थर्रा देती सारी कायनात |
मन ही मन जलता आया
सारा अवसाद छिपाया
सारी सीमा पार हों गयी
सहनशक्ति जबाब दे गयी |
विस्फोट हुआ ज्वाला निकली
धुंआ उठा चिंगारी उड़ीं
हाथ किसी ने नहीं बढाया
साथ भी नहीं निभाया |
समझा गया हूँ क्रोधित
इसी से आग उगल रहा
पर कारण कोई जान पाया
मन मेरा शांत कर पाया |
बढ़ने लगी आक्रामकता
तब भयभीत हो राह बदली
बरबादी के कहर से
स्वयम् भी बच पाया |
बढ़ी विकलता , आह निकली
बहने लगी अश्रु धारा
पर शांत भाव आते ही
ज़मने लगी , बहना तक भूली |
फिर जीवन सामान्य हो गया
कुछ भी विघटित नहीं हुआ
है यह कैसी विडंबना
सवाल सहनशीलता पर उठा |
बार बार आग उगलना
फिर खुद ही शांत होना
कहीं यह संकेत तो नहीं
सब कुछ समाप्त होने का |

आशा लता सक्सेना |

1 comment:

surendrshuklabhramar5 said...

आदरणीया आशा जी मन की व्यथा और जीवन के झंझावात को सुन्दर ढंग से व्यक्त किया गया ...उत्तम रचना
आभार
भ्रमर ५

बढ़ी विकलता , आह निकली
बहने लगी अश्रु धारा
पर शांत भाव आते ही
ज़मने लगी , बहना तक भूली |
फिर जीवन सामान्य हो गया
कुछ भी विघटित नहीं हुआ
है यह कैसी विडंबना
सवाल सहनशीलता पर उठा |