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Tuesday, 25 December 2012

आत्म मंथन

देह रोग -शैया पर पड़ी 
डोर सहस्त्र बंधनॉ की चढी 

नेत्रों को कष्ट देना है मना 
तनाव कहीं ज्वर का कर न  दे दूना 
मुख  को भी देना है विश्राम 
 कि बोलने से  महती शक्ति होती बेकाम

हाथों को रखना शांत अधिक न डुलाना 
अतिक्रिया शीलता से है बड़ा ही  खतरा 
पैरों  को चाल नहीं देनी है ज्यादा 
डगमगा कर गिरने को ना हो आमादा 
उदर  तो बेचारा यूँ ही शांत है
जिव्ह्या का स्वाद जो बिगाड़ बैठा 
पर  फिर भी इस मन को कोई वैद भी न डाट सका 
न धमका सकी किसी माँ  की फटकार 
न  काट सकी इसके पंख चेतावनियाँ 
पहुंच गया प्रति पल गतिमान पी की नगरिया 

लाता ही होगा अगला पल कोई नई खबरिया
मुक्ति मार्ग को प्रशस्त कर पाने की खबरिया |
कवयित्री---
रूचि सक्सेना







3 comments:

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर सटीक प्रस्तुति..

surendrshuklabhramar5 said...

रूचि जी जय श्री राधे बहुत सुन्दर जज्बात ...जीवन वृत्तांत झलका ..चेतावनी देती और समझ बढ़ाती हुयी अच्छी रचना ...सुन्दर कृपया और लिखती रहें
बधाई .......... भ्रमर 5

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 30/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!