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Saturday, 8 September 2012

यदि ऐसा होता


यदि ऐसा होता

उपालंभ तुम देते रहे
हर बार उन्हें वह सहती रही
जब दुःख हद से पार हुआ
उसका जीना दुश्वार हुआ
कुछ अधिक सहा और सह न सकी
उसका मन बहुत अशांत हुआ
पानी जब सिर से गुजर गया
उसने सब पीछे छोड़ दिया
निराशा मन में घर करने लगी
जीने का मोह भंग हुआ
अपनी खुशियाँ अपने सुख दुःख
मुट्ठी में बंद किये सब कुछ
अरमानों की बलिवेदी पर
खुद की बली चढ़ा बैठी
जीते जी खुद को मिटा बैठी
दो शब्द प्यार के बोले होते
दिल के रहस्य खोले होते
जीवन में इतनी कटुता ना होती
वह हद को पार नहीं करती
सदा तुम्हारी ही रहती |
आशा
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः

3 comments:

surendrshuklabhramar5 said...

आदरणीया आशा जी अभिवादन सच में ये प्यार के दो बोल बहुत वजन रखते हैं प्रेम बढ़ता है प्राण आता है कटुता ख़त्म होती है ...बहुत सुन्दर ..
काश लोग इस का ध्यान रखें
आभार
भ्रमर ५

सुमित प्रताप सिंह Sumit Pratap Singh said...

सुन्दर...

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

सुमित जी धन्यवाद और आभार रचना को प्रोत्साहन देने के लिए
भ्रमर ५